मंगलवार, 17 मई 2016

योगेन्द्र कृष्णा की कवितायें

        

         योगेन्द्र कृष्णा की कवितायें

दूर दराज किसी शहर या गाँव में कविता लिखने वाले किसी यथार्थजीवी कवि पर भूमंडलीकृत  आलोचना की नजर एकदम नहीं  पहुँचती है । हुकुम ठाकुर और योगेन्द्र कृष्णा व ओमप्रकाश मिश्र ऐसे कवियों में हैं जो कविता लिख भर नही रहे जीवन के छोटे छोटे क्षणों में जी भी रहे हैं । आज जब पुरस्कार , जोड तोड , छल, छद्म निजी कैरियर आलोचना के मापदंड बन गए हैं । जीवन के तमाम संकटों से मुठभेड करते हुए उपार्जित मौलिकता हाशिए की तरफ ढकेली जा रही है । तो योगेन्द्र कृष्णा जैसे कवि के लिए असली खतरा 'व्यवस्था' से नहीं है बल्कि अपनी जात मे सम्मिलित व्यवस्था के मुखौटों से है । योगेन्द्र की कविताएं विघटन के शिकार जनतान्त्रिक मूल्यों की खतरनाक स्थिति का बही खाता हैं | और कविता का कवि व्यवहारिक समस्याओं और खतरों के चुंगुल मे फँसी संवेदनाओं का पुतला है । व्यवहारिकता और संवेदनाओं का आत्मसंघर्ष उनकी कविता को भयावह परिवेश के मुहाने पर खड़ा कर देता है |  इसलिए उनकी कवित धुंध की तरह व्याप्त अनास्था सन्त्रस्त और प्रपीडित मानव की व्यथा कथा कहती है एक ऐसा मानव जो टूटता हुआ घुटता हुआ जीने की यन्त्रणा वहन करता है । ये यन्त्रणाएं केवल सत्ता की सुरक्षा के लिए है | यही कारण योगेन्द्र सत्ता प्रायोजित हत्यारों का प्रतिरोध करते है | ऐसा नहीं है कि कवि का यह गुस्सा  महज बहाना है या छद्म है । जो व्यक्ति संवेदनशील होता है वह वर्तमान के बडे हिस्से को भविष्य से जोडकर देखता है । आम अनुभव और संवेदनशील अनुभव मे यही अन्तर है ।योगेन्द्र की कविताओं का बड़ा हिस्सा सामान्य अनुभव को भी तल्ख़ भाषा के सहारे संवेदित अनुभव में तब्दील कर रहा है | विचार उनकी कविता में स्पष्ट और सीधी रेखा के बाएं ही है इसलिए उनकी कवितायें लोकधर्मी परम्परा का नया विजन लेकर उपस्थित हो रही है उनकी अनास्था को हमें समय की विसंगतियों से न जोड़कर एक निहत्थे आदमी के तनाव के रूप में देखना चाहिए आइये बहुत दिन बाद लोकविमर्श में योगेन्द्र कृष्ण की कविताओं को पढ़ते हैं



हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं

हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं
वे तुम्हें ऐसे नहीं मारते
बख्श देते हैं तुम्हें तुम्हारी जिंदगी
बड़ी चालाकी से
झपट लेते हैं तुमसे
तुम्हरा वह समय
तुम्हारी वह आवाज
तुम्हारा वह शब्द
जिसमें तुम रहते हो

तुम्हारे छोटे-छोटे सुखों का
ठिकाना ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
तुम्हारे छोटे-छोटे
दुखों और उदासियों के कोने
बिठा देते हैं पहरे
जहां-जहा तुम सांस लेते हो

रचते हैं झूठ
और चढ़ा लेते हैं उस पर
तुम्हारे ही समय
तुम्हारी ही आवाज
तुम्हारे ही शब्दों के
रंग रस गंध

वे
तुम्हारे ही शब्दों से
कर देते हैं
तुम्हारी हत्या

•••
हत्यारे जब मसीहा होते हैं

हत्यारे जब मसीहा होते हैं
वे तुम्हें ऐसे नहीं मारते...

बचा लेते हैं ढहने से
खंडहर होते तुम्हारे सपनों
की आखिरी ईंट को
किसी चमत्कार की तरह...

कि तुम इन हत्यारों में ही
देख सको
दैवी चमत्कार की
अलौकिक कोई शक्ति

तुम्हारी जर्जरित सांसों के
तार-तार होने तक
वे करते रहेंगे
और भी कई-कई चमत्कार
कि तुम इन्हें पूज सको
किसी प्राच्य देवता की तरह...

कि तुम्हारी अंतिम सांस के
स्खलित होने के ठीक पहले
उनके बारे में दिया गया
तुम्हारा ही बयान
अंतत: बचा ले सके उन्हें
दरिंदगी के तमाम संगीन आरोपों से...

हत्यारे जब प्रेमी होते हैं

हत्यारे जब प्रेमी होते हैं
वे तुम्हें ऐसे नहीं मारते...

वे तुम्हें, तुम्हारी मां
या तुम्हारे बच्चों में
कोई फर्क नहीं करते

वे उन सब के साथ
एक ही जगह
एक ही समय
रच सकते हैं
सामूहिक प्रेम का
नया कोई शिल्प

बुखार में तपती
तुम्हारी देह के साथ भी
वे अपने लिए
रच सकते हैं
वीभत्स मांसल आनंद का
नया कोई निर्वीर्य संस्कार

और इस तरह
वे रह सकते हैं
तुम्हारी देह से अविरत आबद्ध...
तुम्हारी अंतिम सांस के
स्खलित हो जाने तक...

•••

पहचान

मरने के बाद भी
हमारी आदतें बरकरार हैं
कब्रिस्तान में कब्रों पर
इन आदतों के
अलग-अलग निशान हैं

किन्हीं सपाट कब्रों पर
हरे-हरे घास हैं
किन्हीं पर
संगमरमर के चबूतरे
तराशे हुए उनके नाम
और गांव हैं

और भी हैं कब्रें
जहां रुक जाता है पानी
हर बारिश में
जहां धूप नहीं आती
और जम जाती है काई

पृथ्वी पर
बच रहे आदमी
पानी धूप और हवा से
यही उनका रिश्ता है
यही उनकी आदतें
यही उनके नाम
और यही उनके गांव हैं

•••
रोटी से निकले
लहू के निशान

याद है
दृश्य अदृश्य
हर उस शख्स का चेहरा
मुझे अच्छी तरह याद है

जिसने
इस पृथ्वी पर
निरंतर
दूसरों के हिस्से की जंग
सिर्फ अपने पक्ष में जीती है

मुझे हर उस शख्स का चेहरा
अच्छी तरह याद है
जिसने सुरक्षित कर रखे हैं
अपने पास
हमारी जंग के आधे-अधूरे
हथियारों के सर्वाधिकार

हां
मुझे याद है
हर जंग में
हमारे हिस्से की
रोटी से निकले...

नहीं
हम अपनी जंग
उनके हथियारों से
नहीं लड़ सकते
उन हथियारों में
आज भी ताजा हैं...

हमारे हिस्से की
रोटी से निकले
लहू के निशान
•••





4 टिप्‍पणियां:

  1. भाई, इनकी नई कविताएँ भी छापते। पुरानी कविताएँ हैं ये। एक दशक पुरानी। लेकिन धाँसू कविताएँ।

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  2. बहुत आभार भाई उमा, गिरीश जी, जन विजय जी और आनंद जी।

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