सोमवार, 6 जुलाई 2015

मणिमोहन मेहता की कविताएँ


मणिमोहन मेहता जनवादी लेखक संघ के पुराने सदस्य है जनवादी मूल्यों के प्रति प्रबल आस्था ने  उनकी कविता को समकालीन असंगतियों के विरुद्ध अकाट्य तर्क बना दिया है वो युवा हैं अपने समय की हर एक घटना परिघटना के प्रति सतर्क हैं यह सतर्कता उन्हें अभिव्यक्ति में भी सतर्क कर देती है | उनके द्वारा रचे गए अर्थबिम्ब आतंकित माहौल को सही भाषा एवं सही पहचान देते हैं | एक निश्चित जीवन दर्शन से लैस उनकी कवितायें जाने अनजाने में युवा प्रखरता को विद्रोह की गहराई तक ले जाती हैं | मिथक , फंटेसी , बिम्ब, प्रतीक , सपाटबयानी , अप्रस्तुत विधान कविता का ऐसा कोई कलात्मक औज़ार शेष नहीं जिसका उपयोग उनकी कविता में न मिलता हो| मेहता जी को कहने की आदत कम है बहुत थोड़े में सब कुछ कहकर निबटा देते है इस टेक्निक की कविता अब कम लिखी जा रही है जो लिखी भी जा रही है वो अमूर्तन के बोझ में दबकर स्वाहा होती जा रही हैं | मणिमोहन जी की कविता जिस कलात्मक अंदाज़ में लिखी जाती है उसी कलात्मक अंदाज़ में पाठक को भी सहज सतर्क कर देती है आजकल की कविता में यथार्थ के बहाने जिस तरह उधार की जड़ शब्दावली कविता में फिट की जा रही है उससे कविता और कवि दोनों का खोखलापन पहचान में आ जाता है मेहता जी कविता इस मायने में अलग है उनके शब्द जिंदगी के जीवंत अनुभवों का द्वंदात्मक आत्मसंघर्ष हैं | इसलिए भाषा अनजानी , अनपहचानी नहीं है |शिल्प दिक्कत के सकता है पर करता नही है क्योंकि बिम्बों की अर्थ-छवि उनके शिल्प पर प्रभावी है |ध्यान से देखने पर उनकी हर कविता किसी सकारात्मक सचेतन संघर्ष की खोज करती हुई प्रतीत होती है यह खोज नितांत बेमानी और फैसन परस्त खोज नहीं है बल्कि मानवीय संवेदनाओं और धडकनों की सही पकड़ है | आइये आज हम लोकविमर्श में मणिमोहन मेहता जी की कवितायें पढ़ते हैं | चित्र विजेंन्द्र जी के हैं हम उनके आभारी हैं


1 छवियाँ
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चरों तरफ बिखरी हुई हैं
छवियाँ ...

बिजूकों ने धड़ से अलग कर लिए हैं
अपने - अपने सिर
और उन्हें मटकों की तरह
बजा रहे हैं ...

अपने ही हाथों में
अपने ही सिर थामें
नृत्य कर रहे हैं धड़ ...

भगदड़ मची हुई है
शब्दों के बीच

दम घुटने से
मारे गए हैं हजारों
तो लाखों अभी भी दबे हुए हैं
कराहते हुए
चेहरों के मलबे के नीचे ...

नृत्य जारी है !
2 फिर - फिर
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फिर - फिर पढ़ें जाने चाहिए
कुछ - कुछ उपन्यास

फिर - फिर
पढ़ी जानी चाहिए
कुछ - कुछ कहानियाँ
और कविताएँ

फिर -फिर
देखी जानी चाहिए
कुछ - कुछ फिल्में
और पेन्टिंग्स ...

जो छूट गए थे
कुछ - कुछ रंग
कुछ - कुछ चेहरे
कुछ - कुछ भाषा
कुछ - कुछ समय
शायद
मिल जाएँ इस बार

हो सकता है
सृजन के भीतर
लेटे हुए
सर्जक से ही
मुलाकात हो जाये
इस बार ।



3 बिल्ली 
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बहुत ताकतवर थी बिल्ली
हम चुपचाप
देखते ही रह गए
खड़े - खड़े
और वो काँक्रीट से बनी सड़क
पल भर में काट गई ।

4 मकड़ी
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जरा सी कम हुई
हमारी आवाजाही
चीजों के करीब
कि आ धमकती है मकड़ी
और बुन देती है जाले

तस्वीरें , किताबें
गुलदान , सितार या हारमोनियम
सब उसकी ज़द में हैं

हमारे सौंदर्यबोध पर भी
उसकी नज़र है 




5 महाभारत
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सालों बीत गए
रखा हुआ है महाभारत
बुक शेल्फ़ में

कुछ भी तो नहीं हुआ
घर में
लड़ाई - झगड़ा या युद्ध

फिर ख़्याल आया
यह महाकाव्य तो
अंग्रेजी भाषा में अनूदित है

युद्ध के लिए तो
अपनी मातृभाषा चाहिए ।

6 आभासी दुनियाँ
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कभी -कभी लगता है
कि यह स्वप्न
कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ...

अब तो बस एक ही उम्मीद
कि शेल्फ में सजी
कोई भारी भरकम सी किताब
धड़ाम से गिरे
मेरे सिर पर
और मैं जाग जाऊं
हड़बड़ाकर ।

7 वर्मीकल्चर
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लेखक जब केंचुए बन जायें
तो बेहतरीन खाद बनती है
सत्ता की फसल
लहलहाती है

औरों का पता नहीं
पर मुझे तो
इस वर्मीकल्चर पर
शर्म आती है ।




8 मक्खियाँ
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इन मक्खियों के साथ भी
बड़ी परेशानी है
अब देखो न !
कल एक तानाशाह को कै हुई
और वे वहाँ से भी
उठा लाईं शब्द

और अब
भिनभिना रही हैं ।

9 घर
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जैसे किसी पुरानी बावड़ी
या अँधेरे कुँए से
एक साथ उड़ते हुए निकलें
हजारों सफेद कबूतर
बच्चे निकल रहे हैं
स्कूल से बाहर ....

उनींदी हो गई हैं
उनकी सपनीली आँखें
रूखे - सूखे शब्दों से
रोज की तरह
आज भी बेस्वाद हो गया था
उनका लंच
रटी - रटाई भाषा ने
थका के रख दिया है उन्हें

अब बस
घर चाहिए उन्हें
माँ चाहिए
हवा में उछलती गेंद की तरह
जानी पहचानी भाषा चाहिए
अब बस
घर चाहिए ।





10 दुःख
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अपने दुःखों को
ज्यों ही मैंने
अपनी ताकत बनाया
तो लोग दुखी हो गए

इतनी भी आसान नहीं


MANI MOHAN MEHTA 
    MOBILE 09425150346 



1 टिप्पणी:

  1. लोकविमर्श के मंच पर मेरी कविताओं को प्रकाशित करने के लिए हृदय से आभार ।भाई उमाशंकर जी की आलोचकीय टिप्पणी ने जो मेरा हौसला बढ़ाया है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाउँगा ..इस महत्वपूर्ण मंच के माध्यम से मेरा सृजन नए साथियों तक पहुंचेगा और उनकी प्रतिक्रियाओं से भी लेखन को एक नई दिशा मिलेगी ....एक बार पुनः आभार - मणि मोहन

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