बुधवार, 9 सितंबर 2015

कुंवर रवीन्द्र व्यक्तित्व और कृतित्व



    कुंवर रवीन्द्र- व्यक्तित्व और कृतित्व 



कुवंर रवीन्द्र से मेरी मुलाकात पहले हुई और उनके  चित्रों से बाद में मुलाकात हुई । उनसे मिलने के बाद उनके चित्रों से रूबरू होने का मजा ही कुछ और है ।ऐसा नहीं है कि चित्र उनकी निजी कथा है निजी प्रतिबिम्ब है बल्कि उनके चित्रों में उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है ।जितनी सादगी उनके स्वभाव में है उतनी ही सादगी उनके रेखांकनों में हैं जितनी गम्भीरता उनके चित्रों में हैं उतनी गम्भीरता उनके आभामंडल में है उनका स्वभाव व सहजता , भावुकता व कल्पनाशीलता उनके चित्रों में समाहित है ।


 अक्सर वो लाल रंग और गेरुए रंग का प्रयोग करते है़ मुझे लगता है चित्र की आभा में गेरुवा रंग उनकी वैचारिक पक्षधरता को व्यक्त करता है । दक्षिणपंथी केसरिया पसंद करते हैं तो समाजवादी हरे रंग का नीला रंग दलित आन्दोलन के उत्थान का प्रतीक है तो लाल गेरुवा प्रगतिशील व्यक्तित्व का पंसदीदा रंग होता है । जहां भी उन्होने लाल गेरुवा का प्रयोग किया है वहां पर उनके चित्र समाज की असंगतियों का बिम्ब बनाते प्रतीत होते है । इस वैचारिक पक्ष का प्रभाव उनके बहुत से चित्रों में समाहित है जब भी वो पहाड के आस पास पक्षी या पेढ का बिम्ब तैयार करते हैं तो मानव जीवन की कठिन परिस्थितियों का  का खाका तैयार हो जाता है । अक्सर ऐसे चित्र नीले रंग के बेस में हरियाली लेकर बनाते हैं । नीले का आशय है शोषित , दबे कुचले समुदाय को हरे रंग अर्थात समाजवाद की शिक्षा देते है़ |


 आज जब चारो और स्वार्थ अपने चरम पर हो और मूल्य नैतिकतायें अपना अस्तित्व खोती जा रही हो ऐसे समय में कुवंर रविन्द्र के चित्र  मूल्यों के पक्ष में आशा की एक जगमग रोशनी के साथ हमारे सामने उपस्थित होते है और हमारे अन्दर एक नयी उमंग का संचार करते है |उनके चित्रों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि कोई भी कलाकार अपनी तूलिका से इतने भावों को तभी समाहित कर सकता है जब वह कवि ह्रदय हो | नही तो उसका चित्राकन मात्र कोरा दिखावा बन कर रह जायेगा  यही बात इन्हें दूसरे चित्रकारों से अलग करती है कुवंर रविन्द्र के चित्रों में लय दिखाती है एक टीस कसकती है जो मानव मन को उद्वेलित बगैर नही रह सकती है उनके चित्र जीवंत कहानी कहते है वे मानो कुछ कहने को आतुर हो और मानव मन की गहरी समझ के साथ सामने आते हैं | इन्होने अपनी तूलिका का रुख उस और किया जिस ओर या तो चित्रकार को समाप्त होने का जोखिम दिखता है या तो सहज रूप से वह जाना नही चाहता है | सरसरी तौर पर देखा जाय तो के. रविन्द्र उस और गए ही नही अपितु उस कठिन जीवन को यथार्थ  के रंग में रंगकर  परिष्कृत किया  और दुरुहता को सहजता की दृष्टि दी |  


इनके चित्रों को गौर से देखने पर एक बात जो उभर कर सामने आती है वह प्रतिरोध |  और यही प्रतिरोध इनके चित्रों का प्राण है | यद्यपि सामंती परिवेश में पले बढे किन्तु कभी भी इन्होने उसे स्वीकार नही किया वे राजकुमार राकेश के कहानी संग्रह साउथब्लाक में गांधी की कहानी दिल्ली दरवाजा के अमीनुद्दीन अंसारी के सामान सारी सुविधाओं और दंभों को त्यागकर आमजनमानस की पीड़ा को अपने  कर्मक्षेत्र का आधार बनाया और उसी को लगातार संबर्धित कर रहे हैं | सामंती व्यवस्था के विरोध में चित्रों द्वारा  प्रतिरोध कर रहे है |


इनके चित्रों में कविता समायी है और कविता में इनके चित्र समाये हुये है अर्थात कविता और चित्र एक दूसरे के विरोधी नही वरन पूरक के रूप में हमारे सामने आते हैं |एक आमजन जैसी जीवन शैली इनकी खाशियत है | इनके प्रत्येक चित्र में कुछ न कुछ सन्देश छिपा होता है जिसे जानने की जितनी कोशिश की जाती है वह उतना ही उलझता हुआ महसूस होता है |इनके चित्रों में दुहराव की स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है यदि ऐसा समझ में भी आता है तो वह अन्य परिवेश को बयाँ करता है | इनके द्वारा पत्रिकाओं पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ कवियों विद्वानों के चित्र उकेरे गए जो बहुत ही प्रभावी लगते है यद्यपि यह फेहरिस्त बहुत लम्बी है जिसमें बड़े से लेकर छोटे तक सम्मिलित हैं | साथ ही साथ मित्रों बड़े कवियों लेखकों की कविता लेखों पर इनके चित्र अद्वितीय हैं | कुछ नाम मेरे मन में दस्तक दे रहे हैं उनमे केशव , महेश पुनेठा , बुद्धिलाल पाल , मान बहादुर सिंह , संतोष चतुर्वेदी ,मखदूम ,स्वयम की कविताओं पर अनेक चित्र उन्होंने बनाया जो सजीवता के साथ व्यक्ति को संवेदित करतें हैं |


स्त्री उनके चित्रों में अपनी वास्तविक अवस्था में उतर आयी है गांव और कस्बों में पारिवारिक 
सामन्ती दायरे में झटपटा रही स्त्री , समाज से संघर्ष करके थक हार चुकी विखंडित मन स्त्री , मेहनतकश स्त्री , जीवन के प्रति सम्मोहित स्त्री , प्यार और भावना में खुद को भूल चुकी स्त्री लगभग सभी प्रकार के बिम्ब रवीन्द्र ने बनाएं है | उनके स्त्री चरित्र वाले रेखांकन मन पर बहुत प्रभावी होते हैं | वो केवल रेखांकन ही नही करते स्त्रीयोचित भावना और संवेदना से भी युक्त कर देते है |बहुत कुछ उन चित्रों में जैसे प्राण संचार  भी भर देते है़ ऐसा लगने लगता है मानों अपने दुखों की पीडा अभी बोल देगी अभी कहेगी 'कि मैं ईश्वर के कोप से नहीं अपनी किस्मत से नही मैं व्यवस्था से छली गयी हूं मेरी ओर देखो और सोचो कया यही मेरा हक है यही मेरी स्वतन्त्रता है । स्त्री पर बनाए चित्रों में रवीन्द्र ने चेतन और अचेतन दोनो सत्ताओं को नाभिनालबद्ध कर दिया है | वह चेतन से अचेतन सत्ता का संवाद कराने में महिर हैं जैसे खिडकी के पास अपने कमरे में बन्द स्त्री ऐसी लग रही है मानो वह जीवन में सुखद वायु की कामना से थकी हारी खिडकी के करीब खडी है कहीं से एक झोंका नवचेतना का आए और वह अपने दुखों को तत्काल भूल जाए ।मानो वह खिडकी से कह रही हो कि सखी अभी बन्द न होना अभी आशाएं शेष हैं । खिडकी खुद अपने आप मे नवचेतना का बिम्ब बन जाती है |



कुवंर रवीन्द्र के चित्रों मे अक्सर चिडिया आती है । यह चिडिया अकारण नहीं है ये रवीन्द्र के पक्ष को लेकर गहन सांकेतिकता व्यंजित करती है । चिडिया एक मामूली जीव है । चिडिया सबसे कम शक्तिशाली जीव है वह अपना जीवन अपने द्वारा चुगे गए दानों से चलाती है ।वह मेहनतकश है एक प्रकार से मेहनतकश वर्ग की संवेदनाओं को रवीन्द्र जी ने चिडिया के रूप मे दिखाया है ।ये सम्वेदनाएं कहीं संवाद करती है़ तो कहीं भविष्य के सपने बुनती है़ कही दुख पीडित मनुष्य के अकेलेपन को  तोडती है । मनुष्य के साथ चिडिया का आशय है कि अगर मनुष्य अपने आप से असंतुष्ट है तो उसे अपना ध्यान मेहनत कश वर्ग की दुखद स्थितियों की ओर ले जाना चाहिए ।रवीन्द्र की चिडिया कहीं भी सुखी मनुष्य के पास नही बैठती वह दुखी और अकेले मनुष्य के पास बैठी मिलती है । दुख मे दिलाशा , अकेलेपन में स्वर , जीवन में संवेदना , को भरती यह चिडिया मेहनतकश समुदायों का वास्तविक आलेख बन गयी है |



लेखक परिचय
नाम – प्रदुम्न सिंह
जनवादी लेखक संघ बाँदा के कोषाध्यक्ष हैं

युवा कवि और निबंधकार है | इनकी कवितायें रस्साकसी , कृतिओर , गाथांतर , आज आदि पत्रिकाओं में व ब्लॉगों में प्रकाशित हो चूँकि है 









8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा आलेख रवीन्द्र जी के बारे में ....धन्यवाद प्रधुम्न जी

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  3. रविन्द्र सर के बारे में संग्रहणीय आलेख है भाई बधाई।

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  4. रविन्द्र सर के बारे में संग्रहणीय आलेख है भाई बधाई।

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  5. रविन्द्र सर के बारे में संग्रहणीय आलेख है भाई बधाई।

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  6. कुंवर रबिन्द्र जी पर कई बार लिखने की कोशिश करता था लेकिन कुछ अधुरा सा लगता था और हर बार बीच में ही लेख छुट जाता था किन्तु यह था कि उन पर लिखना है और वह समय कब मिलेगा इसका समय नही पता था पर आचार्य जी की प्रेरणा और कुंवर रविन्द्र के चित्र बरबस आकर्षित करते थे और उसका परिणाम आप सब के सामने है |भाई उमाशंकर परमार जी और रबिन्द्र जी का आभार जिनसे मुझे इतना सीखने को मिला

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